पुरुषोत्तम प्राप्तियोगः (श्रीमदभगवदगीता - अध्याय 15 )

श्रीश्रीश्री त्रिदंडि चिन्नश्रीमन्नारायण रामानुज जीयर स्वामीजी की दिव्य वाणी से

श्रीमदभगवदगीता का मूल Download pdf for parayana

श्लोक        1 - 10        11 - 20      
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श्री भगवानुवाच
ऊर्ध्व मूल मध श्शाखं
अश्वत्थं प्राहु रव्ययं|
छंदांसि यस्य पर्णानि
य स्तं वेद स वेदवित् ||
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अध श्चोर्ध्वं प्रसृता स्तस्य शाखाः
गुण प्रवृद्धा विषयप्रवालाः|
अधश्च मूला न्यनुसंततानि
कर्मानुबंधीनि मनुष्यलोके ||
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न रूप मस्येह तथोपलभ्यते
नांतो न चादि र्नच संप्रतिष्ठा|
अश्वत्थ मेनं सुविरूढ मूलं
असंगश स्त्रेण दृढेन छित्त्वा ||
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ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन् गता न निवर्तंति भूयः|
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्येत्
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ||
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निर्मानमोहा जितसंगदोषाः
अध्यात्म नित्या विनिवृत्त कामाः|
द्वंद्वै र्विमुक्ता स्सुख दुःख संज्ञैः
गच्छंत्य मूढाः पद मव्ययं तत् ||
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न तद्भासयते सूर्यो
न शशांको न पावकः|
यद्गत्वा न निवर्तंते
तद्धाम परमं मम ||
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ममै वांशो जीवलोके
जीवभूत स्सनातनः|
मन ष्षष्ठाणींद्रियाणि
प्रकृतिस्थानि कर्षति ||
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शरीरं यदवाप्नोति
यच्चा प्युत्क्राम तीश्वरः|
गृहीत्वै तानि संयाति
वायु र्गंधा निवाशयात् ||
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श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च
रसनं घ्राणमेव च|
अधिष्ठाय मन श्चायं
विषया नुपसेवते ||
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उत्र्कामंत स्थितं वापि
भुंजानं वा गुणान्वितं|
विमूढा नानुपश्यंति
पश्यंति ज्ञानचक्षुषः ||
श्लोक        1 - 10        11 - 20