श्रद्धात्रयविभागयोगः (श्रीमदभगवदगीता - अध्याय 17 )

श्रीश्रीश्री त्रिदंडि चिन्नश्रीमन्नारायण रामानुज जीयर स्वामीजी की दिव्य वाणी से

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श्लोक        1 - 10        11 - 20       21 - 28      
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अर्जुन उवाच
ये शास्त्र विधि मुत्सृज्य
यजंते श्रद्धऽयान्विताः|
तेषां निष्ठा तु का? कृष्ण!
सत्त्व माहो रज स्तमः ||
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श्री भगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा
देहिनां सा स्वभावजा|
सात्त्विकी राजसी चैव
तामसी चेति तां शृणु ||
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सत्त्वानुरूपा सर्वस्य
श्रद्धा भवति भारत!|
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो
यो यच्छ्रद्ध स्स एव सः ||
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यजन्ते सात्त्विका देवान्
यक्षरक्षांसि राजसाः|
प्रेतान् भूतगणां श्चान्ये
यजंते तामसा जनाः ||
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अशास्त्र विहितं घोरं
तप्यंते ये तपो जनाः|
दंभाहंकार संयुक्ताः
काम राग बलान्विताः ||
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कर्शयंत श्शरीरस्थं
भूत ग्राम मचेतसः|
मां चैवांत श्शरीरस्थं
तान् विद्ध्यासुर निश्चयान् ||
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आहार स्त्वपि सर्वस्य
त्रिविधो भवति प्रियः|
यज्ञ स्तप स्तथा दानं
तेषां भेद मिमं शृणु ||
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आयु स्सत्त्व बलारोग्य
सुख प्रीति विवर्धनाः|
रस्या स्स्निग्धा स्थिरा हृद्याः
आहारा स्सात्त्विक प्रियाः ||
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कट्वाम्ल लवणा त्युष्ण
तीक्ष्ण रूक्ष विदाहिनः|
आहारा राजस स्येष्टाः
दुःखशोकाऽमय प्रदाः ||
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यातयामं गतरसं
पूति पर्युषितं च यत्|
उच्छिष्ट मपि चा मेध्यं
भोजनं तामस प्रियम् ||
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