गुणत्रयविभागयोगः (श्रीमद्भगवद्गीत - चतुर्दशोऽध्यायः )

श्रीश्रीश्री त्रिदंडि चिन्नश्रीमन्नारायण रामानुज जीयर स्वामीजी की दिव्य वाणी से

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अथ 
गुणत्रयविभागयोगः

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श्री भगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि
ज्ञानानां ज्ञान मुत्तमम् |
यद् ज्ञात्वा मुनय स्सर्वे
परां सिद्धि मितो गताः ||
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इदं ज्ञान मुपाश्रित्य
मम साधर्म्य मागताः |
सर्गेऽपि नोपजायंते
प्रलये न व्यथंति च ||
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मम योनि र्मह द्ब्रह्म
तस्मिन् गर्भं दधा म्यहम् |
संभव स्सर्वभूतानां
ततो भवति भारत! ||
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सर्व योनिषु कौंतेय!
मूर्तय स्संभवंति याः |
तासां ब्रह्म महद्योनिः
अहं बीजप्रदः पिता ||
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सत्त्वं रज स्तम इति
गुणाः प्रकृति संभवाः |
निबध्नंति महाबाहो!
देहे देहिन मव्ययम् ||
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तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्
प्रकाशक मनामयं |
सुख संगेन बध्नाति
ज्ञान संगेन चानघ! ||
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रजो रागात्मकं विद्धि
तृष्णा संग समुद्भवम् |
तन्निबध्नाति कौंतेय!
कर्मसंगेन देहिनम् ||
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तम स्त्वज्ञानजं विद्धि
मोहनं सर्वदेहिनां |
प्रमादालस्य निद्राभिः
तन्निबध्नाति भारत! ||
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सत्त्वं सुखे संजयति
रजः कर्मणि भारत! |
ज्ञान मावृत्य तु तमः
प्रमादे संजय त्युत ||
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रज स्तम श्चाभिभूय
सत्त्वं भवति भारत! |
रज स्सत्त्वं तम श्चैव
तम स्सत्त्वं रज स्तथा ||
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