राजविद्याराजगुह्ययोगः (श्रीमद्भगवद्गीत - नवमोऽध्यायः )

श्रीश्रीश्री त्रिदंडि चिन्नश्रीमन्नारायण रामानुज जीयर स्वामीजी की दिव्य वाणी से

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अथ 
राजविद्याराजगुह्ययोगः

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श्री भगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं
प्रवक्ष्या म्यनसूयवे |
ज्ञानं विज्ञान सहितं
यद्‌ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||
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राजविद्या राजगुह्यं
पवित्र मिद मुत्तमम् |
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं
सुसुखं कर्तु मव्ययम् ||
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अश्रद्दधानाः पुरुषाः
धर्मस्यास्य परंतप |
अप्राप्य मां निवर्तंते
मृत्युसंसारवर्त्मनि ||
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मया ततमिदं सर्वं
जग दव्यक्तमूर्तिना |
मत्‌ स्थानि सर्वभूतानि
न चाहं तेष्ववस्थितः ||
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न च मत्‌ स्थानि भूतानि
पश्य मे योगमैश्वरम् |
भूतभृन्न च भूतस्थः
ममात्मा भूतभावनः ||
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यधाकाशस्थितो नित्यं
वायु स्सर्वत्रगो महान् |
तथा सर्वाणि भूतानि
मत्‌स्थानी त्युपधारय ||
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सर्वभूतानि कौंतेय!
प्रकृतिं यांति मामिकाम् |
कल्पक्षये, पुनस्तानि
कल्पादौ विसृजाम्यहम् ||
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प्रकृतिं स्वां मवष्टभ्य
विसृजामि पुनः पुनः |
भूतग्राम मिमं कृत्स्नं
अवशं प्रकृते र्वशात् ||
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न च मां तानि कर्माणि
निबध्नंति धनंजय |
उदासीनव दासीनं
असक्तं तेषु कर्मसु ||
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मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः
सूयते सचराचरम् |
हेतुनाऽनेन कौंतेय!
जगद्धि परिवर्तते ||
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