श्रीविष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम्

रचयिता: व्यास महर्षि

श्रीश्रीश्री त्रिदंडि चिन्नश्रीमन्नारायण रामानुज जीयर स्वामीजी की दिव्य वाणी से

श्लोक          1 - 10        11 - 20      21 - 30      31 - 40      41 - 50      51 - 60      61 - 70      71 - 80      81 - 90      91 - 100      101 - 108     
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श्लोकालु-
विश्वं विष्णु र्वषट्कारो भूत भव्य भवत्‌ प्रभुः |
भूतकृत्‌ भूतभृ द्भावो भूतात्मा भूतभावनः ||
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पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमागतिः |
अव्ययः पुरुष स्साक्षी क्षेत्रङ्ञोऽक्षर एव च ||
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योगो योगविदां नेता प्रधान पुरुषेश्वरः |
नारसिंहवपु श्श्रीमान्‌ केशवः पुरुषोत्तमः ||
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सर्व श्शर्व श्शिव स्थ्साणुः भूतादि र्निधि रव्ययः |
संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभु रीश्वरः ||
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स्वयंभू श्शंभु रादित्यः पुष्क राक्षो महास्वनः |
अनाधिनिधनो धाता विधाता धातु रुत्तमः ||
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अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः |
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ||
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अग्राह्य श्शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः |
प्रभूत स्त्रिककुद्धाम पवित्रं मंगळं परम्‌ ||
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ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः |
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ||
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ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः |
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतङ्ञः कृति रात्मवान्‌ ||
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सुरेश श्शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः |
अह स्संवत्सरो व्याळः प्रत्यय स्सर्वदर्शनः ||
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