श्रीविष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम् - उत्तरपीठिका

रचयिता: व्यास महर्षि

श्रीश्रीश्री त्रिदंडि चिन्नश्रीमन्नारायण रामानुज जीयर स्वामीजी की दिव्य वाणी से

श्लोक          1 - 10        11 - 20      21 - 30      31 - 34     
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उत्तर प्रार्थन
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवश्य महात्मनः |
नाम्नां सहस्रं दिव्यानां अशेषेण प्रकीर्तितम्‌ ||
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य इदं शृणुयात्‌ नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्‌ |
नाशुभं प्राप्नुयात्‌ किञित्‌ सोऽमुत्रेह च मानवः ||
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वेदांतगो ब्राह्मण स्स्यात्‌ क्षत्रियो विजयी भवेत्‌ |
वैश्यो धनसमृद्ध स्स्यात्‌ शूद्र स्सुख मवाप्नुयात्‌ ||
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धर्मार्धी प्राप्नुया द्धर्मं अर्धार्धी चार्थ माप्नुयात्‌ |
कामा नवाप्नुयात्‌ कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्‌ प्रजाः ||
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भक्तिमान्‌ यस्सदोत्थाय शुचि स्तद्गत मानसः |
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्ना मेतत्‌ प्रकीर्तयेत्‌ ||
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यशः प्राप्नोति विपुलं याति प्राधान्य मेव च |
अचलां श्रिय माप्नोति श्रेयः प्राप्नो त्यनुत्तमम्‌ ||
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न भयं क्वचि दाप्नोति वीर्यं तेजश्च विंदति |
भव त्यरोगो द्युतिमान्‌ बलरूप गुणान्वितः ||
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रोगार्तो मुच्यते रोगात्‌ बद्धो मुच्येत बंधनात्‌ |
भया न्मुच्येत भीतस्तु मुच्ये दापन्न आपदः ||
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दुर्गा ण्यतितर त्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम्‌ |
स्तुव न्नामसहस्रेण नित्यं भक्ति समन्वितः ||
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वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेव परायणः |
सर्वपाप विशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम्‌ ||
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