दैवासुरसंपद्विभागयोगः (श्रीमदभगवदगीता - अध्याय 16 )

श्रीश्रीश्री त्रिदंडि चिन्नश्रीमन्नारायण रामानुज जीयर स्वामीजी की दिव्य वाणी से

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श्लोक        1 - 10        11 - 20       21 - 24      
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श्री भगवानुवाच
अभयं सत्त्व संशुद्धिः
ज्ञानयोग व्यवस्थितिः|
दानं दमश्च यज्ञश्च
स्वाध्याय स्तप आर्जवम् ||
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अहिंसा सत्य मक्रोधः
त्याग श्शांति रपैशुनम्|
दया भूते ष्वलोलुप्त्वं
मार्दवं ह्री रचापलम् ||
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तेजः क्षमा धृति श्शौचं
अद्रोहो नातिमानिता|
भवंति संपदं दैवीं
अभिजातस्य भारत! ||
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दंभो दर्पोऽभिमान श्च
क्रोधः पारुष्य मेव च|
अज्ञानं चा भिजातस्य
पार्थ! संपद मासुरीम् ||
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दैवी संप द्विमोक्षाय
निबंधा याऽसुरी मता|
माशुच स्संपदं दैवीं
अभिजातोऽसि पांडव! ||
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द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्
दैव आसुर एव च|
दैवो विस्तरशः प्रोक्तः
आसुरं पार्थ! मे शृणु ||
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प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च
जना न विदु रासुराः|
न शौचं नापि चाऽचारो
न सत्यं तेषु विद्यते ||
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असत्य मप्रतिष्ठं ते
जगदाहु रनीश्वरं|
अपरस्पर संभूतं
कि मन्यत् काम हेतुकम् ||
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एतां दृष्टि मवष्टभ्य
नष्टात्मानोऽल्प बुद्धयः|
प्रभवं त्युग्रकर्माणः
क्षयाय जगतोऽशुभाः ||
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काम माश्रित्य दुष्पूरं
दंभ मान मदान्विताः|
मोहात् गृही त्वाऽसद्ग्राहान्
प्रवर्तंते तेऽशुचिव्रताः ||
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